कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रयासों को नई दिल्ली में मिली सराहना
महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने किया चंपावत एवं अल्मोड़ा के भाषा शिक्षकों का सम्मान
देवभूमि टुडे
चंपावत/नई दिल्ली। कुमाऊँनी भाषा के संरक्षण, संवर्धन एवं नई पीढ़ी को लोकभाषा और संस्कृति से जोड़ने की दिशा में किए जा रहे नायाब प्रयासों को शिक्षक सम्मान समारोह में मान्यता मिली। उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली एवं दिल्ली पैरामेडिकल एंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (DPMI) नई दिल्ली के NDMC कन्वेंशन सेंटर में 6 सितंबर को हुए समारोह में उत्कृष्ट योगदान के लिए चंपावत जिले के भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों को सम्मानित किया गया।
मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने चंपावत एवं अल्मोड़ा जिले से आए भाषा शिक्षकों एवं कार्यकर्ताओं के प्रयासों की प्रशंसा की। कहा कि लोकभाषाओं का संरक्षण केवल भाषा को बचाने का कार्य नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा और जड़ों को सुरक्षित रखने का अहम दायित्व भी है।
पूर्व गवर्नर कोश्यारी ने विशेष रूप से दूरस्थ जिले चंपावत में स्कूली स्तर पर संचालित किए जा रहे कुमाऊँनी भाषा शिक्षण केंद्रों एवं कक्षाओं को मिसाल बताया। कहा कि सीमित संसाधनों और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद समर्पण से किया जा रहा भाषा शिक्षण का कार्य अनुकरणीय है। अन्य वक्ताओं ने कहा कि यदि लोक भाषाओं को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना है, तो विद्यालय इसमें सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
चंपावत से इन 15 भाषा सेवकों का हुआ सम्मान:
शिक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी एवं उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी भूपेंद्र सिंह देव ‘ताऊजी’, कुमाऊँनी भाषा-साहित्य प्रचार समिति के जिला संयोजक एवं ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के पूर्व निदेशक जनार्दन चिल्कोटी, सतीश जोशी, ऋतेश कुमार वर्मा, जनार्दन प्रसाद गड़कोटी, गौरव बंसल, नितिन देव, तुलसी भट्ट, जीवन तिवारी, पुष्पा पाटनी, सीमा जोशी, तुलसी बिष्ट, हेमा बिष्ट, ममता बिष्ट एवं कृपाल सिंह शीला को सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इन सभी भाषा शिक्षकों एवं भाषा सेवकों द्वारा कुमाऊँनी भाषा के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति से जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों को समारोह में रेखांकित किया गया।

विद्यालयों में कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ:
चंपावत जनपद में भाषा संरक्षण अभियान के अंतर्गत विभिन्न विद्यालयों में कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ संचालित की जा रही हैं। इन कक्षाओं में विद्यार्थियों को केवल कुमाऊँनी भाषा ही नहीं, बल्कि लोकगीत, लोककथाएँ, लोकसाहित्य, पारंपरिक शब्दावली, लोक परंपराएँ और क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित कराया जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना तथा कुमाऊँनी भाषा को विद्यालय स्तर पर जीवंत एवं व्यवहारिक बनाए रखना है। भाषा शिक्षकों का मानना है कि जिस भाषा में हमारी लोकस्मृतियां, लोकगीत, कहावतें और पीढ़ियों का अनुभव सुरक्षित है, उसका संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के संरक्षण का अभियान:
आयोजक मंच द्वारा उत्तराखण्ड की प्रमुख लोकभाषाओं कुमाऊँनी, गढ़वाली एवं जौनसारी के संरक्षण, संवर्धन और शिक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी अभियान के अंतर्गत विद्यालयों में भाषा शिक्षण केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि बच्चे अपनी लोकभाषा को पढ़ने, लिखने और बोलने के साथ-साथ उससे जुड़ी संस्कृति को भी समझ सकें।
भाषा संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा देगा सम्मान:
राष्ट्रीय स्तर के मंच पर चंपावत के भाषा शिक्षकों को मिला यह सम्मान पूरे जनपद के लिए गौरव का विषय है। विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालयों के माध्यम से कुमाऊँनी भाषा की कक्षाएँ चलाना इस बात का प्रमाण है कि इच्छा शक्ति और समर्पण के साथ लोकभाषा संरक्षण का अभियान जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
भाषा विशेषज्ञों और आयोजकों ने कहा कि लोकभाषाएँ केवल शब्द या संवाद का माध्यम ही नहीं हैं, बल्कि वे किसी समाज के इतिहास, लोकस्मृति, परंपरा, संस्कृति और सामूहिक पहचान की जीवंत धरोहर भी होती हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए विद्यालय, समाज और परिवार—तीनों को मिलकर काम करना होगा।
समारोह में चंपावत और अल्मोड़ा के शिक्षकों के प्रयासों की सराहना को लोकभाषा संरक्षण के अभियान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। यह सम्मान निश्चित रूप से चम्पावत में चल रहे भाषा संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा देगा और आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा तथा सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


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